Sunday, 28 September 2014

कातिक का चाँद

चाँद कब से है सरे-शाख़े-सनोबर अटका
घास शबनम में शराबोर है, शब है आधी
बाम सूना है, कहाँ ढूंढें किसी का चेहरा
(लोग समझेंगे कि बेरब्त हैं बातें अपनी)

शेर उगते हैं दुखी ज़ह्न से कोंपल-कोंपल
कौन मौसम है कि भरपूर हैं ग़म की बेलें
दूर पहुंचे हैं सरकते हुए ऊदे बादल
चाँद तन्हा है (अग़र उसकी बलाएँ ले लें?)

दोस्तों जी का अजब हाल है, लेना बढ़ना
चाँदनी रात है कातिक का महीना होगा
'मीर' मगफ़ूर के अशआर न पैहम पढ़ना
जीनेवालों को अभी और भी जीना होगा


चाँद ठिठका है सरे-शाख़े-सनोबर कब से
कौन-सा चाँद है किस रुत की हैं रातें लोगों
धुंध उड़ने लगी, बुनने लगी क्या-क्या चेहरे
अच्छी लगती हैं दीवानों की-सी बातें लोगों 

भीगती रात में दुबका हुआ झींगुर बोला
कसमसाती किसी झाड़ी में से ख़ुशबू लपकी
कोई काकुल, कोई दामन, कोई आँचल होगा
एक दुनिया थी मगर हमसे समेटी न गई 


ये बड़ा चाँद चमकता हुआ चेहरा खोले
बैठा रहता है सरे-बाम शबिस्ताँ शब को
हम तो इस शहर में तनहा हैं, हमीं से बोले
कौन इस हुस्न को देखेगा ये इससे पूछो 

सोने लगती है सरे-शाम ये सारी दुनिया
इनके हुज्रों में न दर है न दरीचा कोई
इनकी किस्मत में शबे-माह को रोना कैसा
इनके सीने में न हसरत न तमन्ना कोई


किससे इस दर्दे-जुदाई की शिकायत कहिए 
याँ तो सीने में नयस्ताँ का नयस्ताँ होगा
किससे इस दिल के उजड़ने की हिकायत कहिए
सुननेवाला भी जो हैराँ नहीं हैराँ होगा

ऐसी बातों से न कुछ बात बनेगी अपनी
सुनी आँखों में निराशा का घुलेगा काजल
ख़ाली सपनों से न औक़ात बनेगी अपनी
ये शबे-माह भी कट जाएगी बेकल-बेकल


जी में आती है कि कमरे में बुला लें इसको
चाँद कब से है सरे-शाख़े-सनोबर अटका
रात इसको भी निगल जाएगी बोलो,बोलो
बाम पर और न आएगा किसी का चेहरा


(~ १९५३)

सरे-शाख़े-सनोबर: चीड़ के पेड़ की डाल पर
बेरब्त: निरर्थक
मगफ़ूर: मोक्षप्राप्त
पैहम: निरन्तर
हुज्रों: कुटियों
शबे-माह: चाँदनी रात
नयस्ताँ: जंगल

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