१
इंशा जी बहुत दिन बीत चुके
तुम तन्हा थे तुम तन्हा हो
ये जोग-बिजोग तो ठीक नहीं
ये रोग किसी का अच्छा हो?
कभी पूरब में, कभी पच्छिम में
तुम पुरवा हो, तुम पछुआ हो?
जो नगरी नगरी भटकाए
ऐसा भी न मन में काँटा हो
क्या और सभी चोंचला यहाँ
क्या एक तुम्हीं यहाँ दुखिया हो
क्या एक तुम्हीं पर धूप कड़ी
जब सब पर सुख का साया हो
तुम किस जंगल का फूल मियाँ
तुम किस बगिया की बेला हो
तुम किस सागर की लहर भला
तुम किस बादल की बरखा हो
तुम किस पूनम का उजियारा
किस अन्धी रैन की ऊषा हो
तुम किन हाथों की मेंहदी हो
तुम किस माथे का टीका हो
क्यों शहर तजा क्यों जोग लिया
क्यों वहशी हो क्यों रुस्वा हो
हम जब देखें बहरूप नया
हम क्या जानें तुम क्या-क्या हो
२
जब सूरज डूबे साँझ भए
और फैल रहा अंधियारा हो
किस साज की लय पर झनन-झनन
किस गीत का मुखड़ा जागा हो
इस ताल पे नाचते पेड़ों में
इक चुप-चुप बहती नदिया हो
हो चारों कोट सुगन्ध बसी
ज्यों जंगल पहना गजरा हो
यह अम्बर के मुख का आँचल
इस आँचल का रंग ऊदा हो
इक गोट रुपहले तारों की
और बीच सुनहरा चंदा हो
इस सुन्दर शीतल शांत समय
हाँ बोलो-बोलो फिर क्या हो?
वह जिसका मिलना नामुमकिन
वह मिल जाए तो कैसा हो?
३
क्यों ऐसे सपने देखते हो
इंशा जी तुम आप भी सपना हो
इक बीती लिखते शायर हो
इक गीत उगलती बीना हो
ये बातें मन में वह सोचे
जो क्या बतलाएँ कैसा हो?
वह जिसके हाथ में क़िस्मत की
इक लम्बी गहरी रेखा हो
वह शख़्स पुराने क़िस्सों का
इक मदमाता शह्ज़ादा हो
जो शहर का रस्ता भूला हो
और जंगल में आ निकला हो
वह राजा काशी नगरी का
या वाली-ए-बल्ख़-ओ-बुख़ारा हो
कुछ उसके ताज पे कलग़ी हो
कुछ उसका चाँद-सा चेहरा हो
वह मालिक महल-अटरियों का
या रूपे-सोनेवाला हो
या कोई अनोखा गुनवाला
वह जिसका जग में चर्चा हो
या कोई सजीला बंजारा
जो नगरी-नगरी घूमा हो
४
हम नगरी-नगरी घूमे तो
जब निकले थे आवारा हो
वह लंदन हो वह पेरिस हो
वह बर्लिन हो वह रूमा हो
वह काबुल हो वह बाबुल हो
वह जावा हो वह लंका हो
वह साहिल सैन-ओ-राइन हो
या साहत-ए-नील-ओ-दजला हो
वह चीन का देस विशाल कहीं
या पच्छुम देस अमरीका हो
वह चोटी फ़यूजी यामा की
या आल्प्स का परबत ऊँचा हो
वह छतें गुलाबी लीडन की
या नीला आब जिनेवा हो
दिन इस्तांबुल की गलियों में
या शब की सैर-ए-प्राहा हो
कुछ सूरतें थीं कुछ मूरतें थीं
कुछ और भी शायद देखा हो
जहाँ नज़रें ठहरी-ठिठकी हों
जहाँ दिल का काँटा अटका हो
पर हमको तो कुछ याद नहीं
कुछ खोया हो कुछ पाया हो
इन बातों में इन घातों में
संजोग का कोई लम्हा हो
हम अपने जो ख़ुद आप नहीं
फिर बोलो कौन हमारा हो?
यूँ समझो शहर-सराय में
शब-भर के लिए कोई उतरा हो
कोई परदेसी कोई सैलानी
वो जिसका दूर ठिकाना हो
शाम आए सवेरे कूच किया
जब धुँधला-धुँधला रस्ता हो
जब धरती सूनी-सूनी हो
जब अम्बर फीका-फीका हो
५
इक आलम था क्या आलम था
वो सच्चा हो या झूठा हो
हम अपने आप में डूब गए
ख़ुद पत्थर बन ख़ुद दरिया हो
ज्यों घास का तिनका जंगल में
ज्यों आँधी में कोई पत्ता हो
हम किस से कहें, किस तौर कहें
कोई बात हमारी समझा हो!
हम उस से मिलें जो अपना हो
हम उस से कहें जो हम-सा हो
जब यह भी नहीं, जब वह भी नहीं
क्या बात बने, क्या रस्ता हो
इस ज़िन्दाँ में कोई रौज़न हो
इस गुम्बद में दरवाज़ा हो
६
ऐ जोगी, ऐ दरवेश कोई
क्यों उम्र गँवाए रमता हो
क्यों तन पर राख-भभूत मले
तू गोरखनाथ का चेला हो
ये पूरब-पच्छुम कुछ भी नहीं
ये जोग-बिजोग भी धोका हो
जो तुझसे जुदा सब माया है
पा अपने को गर पाना हो
क्यों और पे जी को रिझाता है
ये पीत की रीत तो फंदा हो
जो हारा जान से हार गया
जो जीता वह भी रुस्वा हो
धूनी न रमा, बिसराम न कर
बस अलख जगाकर चलता हो
तू अपना रह, तू अपना बन
तू इंशा है, तू इंशा हो
तू इंशा है, तू इंशा हो
Friday, 10 February 2012
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