Sunday, 18 October 2009

एक लड़का

एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुँचा हुमकता हुआ
जी मचलता था एक-एक शै पर
मगर जेब ख़ाली थी कुछ मोल ले न सका

लौट आया लिए हसरतें सैकड़ों
एक छोटा-सा लड़का था मैं जिन दिनों

ख़ैर महरूमियों के वो दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूँ तो इक-इक दुकाँ मोल लूँ
आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ

नारसाई का अब जी में धड़का कहाँ
पर वो छोटा-सा, अल्हड़-सा लड़का कहाँ?

[शै=चीज़, महरूमी=ग़रीबी, नारसाई=असमर्थता]

No comments: